Friday, June 19, 2026

जिंदगी

 यूँ न ज़िद करो तुम, ज़िंदगी अकेले न कटती,
जब शाम गुज़रे तन्हा, तो दिल को है चुभती...

दिन तो गुज़रेगा यूँ ही तुम्हारा,
ज़रूरत न मन को किसी का सहारा,
पर ख़ामोश रातें धीमी हैं चलती,
जब शाम गुज़रे तन्हा, तो दिल को है चुभती...

थाम लेना हाथ किसी का कमज़ोरी नहीं है,
खुशियाँ बाँटने जैसी और खुशी नहीं है,
कुछ रिश्ते दुआ बनकर हैं साथ निभाते,
जब शाम गुज़रे तन्हा, तो दिल को है चुभती...

माना कि वक़्त कोई ज़ख्म छोड़ गया,
जिसे कहा अपना, वो पराया कर गया,
क्यों सज़ा दो ख़ुद को, ज़िंदगी ऐसे न चलती,
जब शाम गुज़रे तन्हा, तो दिल को है चुभती...

चलो हमसफ़र न सही, एक दोस्त तो चाहिए,
ख़ामोश लम्हे जो बाँटे, ऐसा कोई चाहिए,
मुस्कुराते हुए उम्र गुज़र जाएगी,
ज़िंदगी फिर और प्यारी हो जाएगी...

यूँ न ज़िद करो तुम, ज़िंदगी अकेले न कटती,
जब शाम गुज़रे तन्हा, तो दिल को है चुभती...
— विभव जोगळेकर

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