Thursday, April 14, 2016

मन फितूर फितूर..

तुझा आवाज ऐकण्या, कान हे आतुर,
डोळे लावून बसलो सखे, तुझ्या वाटेवर,
मन व्याकुळ व्याकुळ, मन आतुर आतुर,
हे माझे न रहाता, तुला फितूर फितूर ।। 

गालावर खळी, त्यावर विसावली बट,
मन व्यापून टाकते, तुझे गोड स्मित,
मिटता लोचने, का मनी हुरहूर, 
हे माझे न रहाता, तुला फितूर फितूर ।।

कधी घरी मी एकटा, किंवा मैफील दोस्तांची,
का सतत चालते, घालमेल ह्या जीवाची, 
का मनाला कायम तुझीच फिकीर, 
हे माझे न रहाता, तुला फितूर फितूर ।। 


Tuesday, January 12, 2016

साजणा


वेळ पहाटेची होती, हाक कोकीळेची होती,
शहारले अंग माझे, मिठी साजणाची होती  - १

दव पानावरी विसावले, चिंब माझे मन झाले,
प्रीतीत न्हाउन  निघाले, प्रीत साजणाची होती  - २

मंद वाऱ्याची झुळूक, संगे पारिजाताचा सुगंध,
हलकेच साद आली, साद साजणाची होती  - ३

नववधू मी लाजले, त्याच्या मिठीत शिरले,
आता ही साजणी, माझ्या साजणाची होती  - ४

Monday, September 14, 2015

आई

You have been strong and calm, carrying that lovely smile, 
Until the train started moving and the tears came rolling down

I still remember your hand raised up to say good bye, 
You feared your son was moving out, in this cruel world, to find his own path

But I could also hear "Dont go away my son" your heart's cry, 
You also had confidence on your love and the 'sanskar's' you had passed

I realize now, when I have a small kid, how difficult it is,
parting away from yourself, its the toughest job

Toughness, tenderness, love and affection, its a package in one,
Only YOU mom, can do this, you are the only one.



Love you आई …

Monday, April 27, 2015

चारोळ्या

चार पावलांवर होतं सुख, मी मात्र चार पावलं मागेच होतो,
हे अंतर कापाण्यामध्येच, सारं आयुष्य वेचीत होतो!
दुख: मात्र सोबतीला, होते पूर्ण आयुष्यभर,
चिंता, क्लेश, विवंचना, सर्व सावलीच्या अंतरावर 
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वेळ पहाटेची, आली साद कोकिळेची, घेऊन मातीचा सुगंध, आली सर पावसाची,
मंद वाऱ्याची झुळूक, सांगे गंध ह्या मातीचा, भान हरपून जाई, खेळ चाले निसर्गाचा. 



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रोज पाहटे नवीन सुरुवात, नवीन  शेवट रोज रात्री,
शून्यातून  शून्याकडे जाणारी, आयुष्याची वाट काटेरी...

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आसमानमें बादल क्या भर आये , हवाओने रुख ही बदल दिया,
प्यासे धरती को प्यासा ही छोड, बादलोने बरसाना  ही छोड दिया।

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 अरे वेड्या का रे तुला विचार एवढा उद्याचा,
आजचा दिवस जगण्याचा नि कालचा विसरण्याचा

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गढूळ झालेल्या पाण्यात आणि गोंधळलेल्या मनात, डोकावाण्यात काहीही अर्थ नसतो,
तळ तर दिसतच नाही, मनुष्य दिशाही हरवून बसतो. 

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जिंदगी वो किताब है, जिसे पढ्ना नही आसान,
हर अध्याय तय करता विधाता, लिखता है इन्सान

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वक्त गुजर जाता हैकभी अच्छा कभी बुरा
छोड जाता है निशानदिल पे बहोत गहरा
संग लाता है खुशिया , कभी दर्द , कभी गम
सोच में पड जाते हैकिसे अपना कहे हम 

Thursday, April 2, 2015

चार दिवारो के भीतर

चार दिवारो के भीतर खामोशी बातें करती है,
बडी सरलता से मुझे ये मुझसे मिलाती है ।१।

चार दिवारो के भीतर मै खुदको सुनता हुं,
तनहा नाही, पार हा, अकेला होता हुं ।२।

चार दिवारो के भीतर मै डरता हुं, रोता हुं ,
दुनिया से परे, मै, मै बनकर जीता हुं ।३।

चूभते है दिल को, उन अतीत के पन्नो को पढता हुं,
हर बार नयी सिख लेकर पन्नो को पलटता हुं  ।४।

चार दिवारो के भीतर तुम्हे महसूस करता हुं,
हर सास तेरे लिये, तेरे सहारे लेता हुं  ।५।

Friday, December 26, 2014

अंतिम सत्य

तो समोर निपचिप पडला होता, श्वास थांबलेला,
आयुष्याचं अंतिम सत्य अनुभवून, सत्यापलीकडे गेलेला… 

नातेवाइक सारे कसे ओक्साबोक्शी रडत होते,
जमलेले लोक सारे, दु:खात त्यांच्या सहभागी होत होते,
आनंद, प्रेम, सु:ख दुखांच्या पलीकडे तो पोचलेला,
आयुष्याचं अंतिम सत्य अनुभवून, सत्यापलीकडे गेलेला… ।।१।।

आयुष्यात त्याने काय कमावलं, काय गमावलं, कळलं नाही,
अतृप्त राहिल्या इच्छा काही, पिंडाला कावळा शिवला नाही,
अर्ध्यावर संसाराचा डाव मोडून तो, अनंतात विलीन झालेला,
आयुष्याचं अंतिम सत्य अनुभवून, सत्यापलीकडे गेलेला… ।।२।।

प्रत्यक्ष नसला तरी आठवणीत आहे तो आता,
कधी मागच्या पडवीत झोपाळ्यावर अभंग गाणारा,
कधी शेतात रमलेला तर, कधी पान खाउन स्वतात रममाण झालेला,
आता आयुष्याचं अंतिम सत्य अनुभवून, सत्यापलीकडे गेलेला… ।।३।।

Tuesday, December 23, 2014

पाउस

कोसळणारा पाउस अनुभवताना,

 सुगंध मातीचा दरवळून गेला, 

वाऱ्यावेगे मनास माझ्या, 

भूतकाळात घेऊन गेला ।।


त्या रात्रीही असाच पाउस, 

दामिनीही संगतीला होती, 

मोगऱ्याची वेणी आणि, 

मोरपंखी साडी तू नेसाली होतीस ।।


पौर्णिमेच्या चंद्रापरी, 

काया तुझी चमकत होती, 

गालावर विसावलेली बट तुझी, 

मनास माझ्या खुणावत होती ।।  


चिंब भिजलेली काया, 

साडीही तुला बिलगून होती,

चिंब पावसातही मनात, 

तहानलेली प्रीत होती ।।

सूर्यास्त - २

सूर्य अस्ताला निघाला, खेळ लाटांचा मंदावला, का अशावेळी खुणावते, अनामिक ओढ ही मनाला... ओढ अशी ही लागते, मन बेचैन असे हे होते, जसे ओळखीचे कोणी,...