चार पावलांवर होतं सुख, मी मात्र चार पावलं मागेच होतो,
वेळ पहाटेची, आली साद कोकिळेची, घेऊन मातीचा सुगंध, आली सर पावसाची,
हे अंतर कापाण्यामध्येच, सारं आयुष्य वेचीत होतो!
दुख: मात्र सोबतीला, होते पूर्ण आयुष्यभर,
चिंता, क्लेश, विवंचना, सर्व सावलीच्या अंतरावर
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वेळ पहाटेची, आली साद कोकिळेची, घेऊन मातीचा सुगंध, आली सर पावसाची,
मंद वाऱ्याची झुळूक, सांगे गंध ह्या मातीचा, भान हरपून जाई, खेळ चाले निसर्गाचा.
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रोज पाहटे नवीन सुरुवात, नवीन शेवट रोज रात्री,
शून्यातून शून्याकडे जाणारी, आयुष्याची वाट काटेरी...
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आसमानमें बादल क्या भर आये , हवाओने रुख ही बदल दिया,
प्यासे धरती को प्यासा ही छोड, बादलोने बरसाना ही छोड दिया।
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अरे वेड्या का रे तुला विचार एवढा उद्याचा,
आजचा दिवस जगण्याचा नि कालचा विसरण्याचा
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गढूळ झालेल्या पाण्यात आणि गोंधळलेल्या मनात, डोकावाण्यात काहीही अर्थ नसतो,
तळ तर दिसतच नाही, मनुष्य दिशाही हरवून बसतो.
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जिंदगी वो किताब है, जिसे पढ्ना नही आसान,
हर अध्याय तय करता विधाता, लिखता है इन्सान
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वक्त गुजर जाता
है, कभी अच्छा कभी
बुरा
छोड जाता है
निशान, दिल पे बहोत
गहरा
संग लाता है
खुशिया , कभी दर्द
, कभी गम
सोच में पड जाते
है, किसे अपना कहे
हम
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