Friday, January 27, 2017

बिरहा की रैना

बिरहा की रैना, मन को ना चैना,
तेरे बिन सजना, अब नहीं रहना।

कानोमें गुंजती है, तेरी बतीयाॅ,
दिल को लुभाती है, तेरी अखीयाॅ,
मन करे, आके तेरे, बाहोमें मीट जाना,
बिरहा कीरैना....(1)

बेरहम वक्त ये, थम सा गया है,
तनहाई मुझपे, लीपट सी गयी है,
मन चाहे, तेरी होकर, तुझमें समाना,
बिरहा की रैना....(2)

साज श्रृंगार कर, बैठी सजनीयाँ,
तेरी राह ताके, मेरी नजरीयाँ,
आजा पीया, अब मुझे, जुदाई सहेना।
बिरहा की रैना....(3)

No comments:

Post a Comment

सूर्यास्त - २

सूर्य अस्ताला निघाला, खेळ लाटांचा मंदावला, का अशावेळी खुणावते, अनामिक ओढ ही मनाला... ओढ अशी ही लागते, मन बेचैन असे हे होते, जसे ओळखीचे कोणी,...